Monday, October 24, 2022

एहसास

 धुप की कड़ी तपिश में

वो तेरा आना

हल्के से कुछ कह के

फिर से गुम हो जाना

याद आती हैं तन्हाई में

मेरी वर्षो की आराधना

तुम ही तो हो

हाँ तुम ही तो हो मेरी साधना


तेरा कुछ नरमी से कहना

और कह के फिर मुझे

एहसासों की महफ़िल में

यूँ तन्हा छोड़ जाना

बा-खुदा जन्नत नहीं तो

और क्या हैं

यूँ रेशमी जज्बातों को

फिर से छेड़ जाती हो

मेरी साधना मुझे

हर पल क्यूँ याद आती हो


 


"अभिषेक"

क्यूँ

 मेरी भीगी हुई आवारा चाहतो के 


आखिरी मुकाम तुझ में ही सिमट के


आ गए क्यूँ


मेरे जलते हुए अरमानो को


मेरी साँसों के गर्म एहसासों को


तुम छु गए क्यूँ


 मेरी बेजान सी पड़ी जिंदगी


मेरी वीरान सी हुई त्रिश्नगी


तुझ में ही लिपट गए क्यूँ


 क्यों हुआ की वो अनजान सा दर्द


मेरे अतीत में ही कही खो गया


और रहा गया तो बस तुम्हारा


वो अक्स जिसे मैं जीता हूँ


रोज खुद में ही कही


संजोता हूँ खुद में ही कही


क्यों हुआ ये


क्यों हुआ ये की तुम आये


और फिर ना रहा कुछ आने को,


और ना ही रहा कुछ पाने को


बस रह गया हैं तो तुम ही तुम


और क्यूँ मैं खुद में ही खो गया हूँ


अब न रही वो मंजिलो की वो प्यास


और न ही रही कुछ पाने की वो आस


क्यूँ की तुम में ही हैं वो सब


जिसकी मैं करता था तलाश


Thursday, October 6, 2022

मेरी साधना

 मेरीआरज़ू के मकबरे से

निकलीदुवाओ की तामिल हो तुम
मेरीसूनी पड़ी जिंदगी की
आहोका सिला हो तुम


मेरीभटकती हुई वीरान जिंदगी
कीपुकार का अंदाज़-ए- बयां हो तुम
तुमही हो मेरी आखिरी मंजिल
जीनेकी वजह भी अब तुम ही हो


हाँतुम ही तो हो पहुंचकर जहा
कुछऔर नहीं पाना चाहता
जीनाचाहता हूँ और तुम्ही पे
फिरखत्म भी होना चाहता हूँ


मेरीगुमनाम साँसों की
भटकतीआरज़ू हो तुम
हाँतुम ही तो हो
मेरीवर्षो की आराधना
हाँतुम ही तो हो मेरी साधना


"अभिषेक"


जीत जाता हूँ

हार हैं जीत हैं

जिंदगी भी क्या अजीब हैं

हारता हूँ, कभी जीत जाता हूँ l

वक्त की बिसात पे यूँ खूब ही

गिर के उठ जाता हूँ


ये आरजू हैं

एक आस हैं

जीने की प्यास हैं

मौत से मिल कर के

हार के भी जीत जाता हूँ l

तूने हारने को और जीतने को

जिंदगी दिया क्या हैं

मिट गयी सब ख्वाहिशे

मिट कर भी हुआ क्या हैं

जीने की कश्मकश ने

प्यादा बनाया हैं

जो पिट कर के भी

जीत जाता हैं l

रात के पथ में

यूँ गुजरे लम्हों को

एक प्यास ने संजोया हैं

जिन्दा हूँ इसलिए

जिंदगी को जीत जाता हूँ l

जिंदगी तू ख्वाब हैं

आरजू हैं या एक त्रिश्नगी

खामखा जीने की एक वजह हैं

या अधूरे अरमानों की

कभी न रुकने वाली

एक कड़ी हैं

या खुद मुझसे लड़ने वाली

एक अन सुलझी पहेली हैं

जो खुद मुझे से ही

निकलकर मुझमे ख़त्म हो जाती हैं

जिंदगी तू भी खुब हैं

मुझसे हार कर जीत जाती हैं l


मुझे मोहरा बना कर

चाल चल जाती हैं

जिंदगी तू भी नित नए

नए रास्ते दिखा के जाती हैं

रुकता हूँ कहीं

कभी पहुच जाता हूँ

वक्त की साजिशो से

फिर भी ए जिंदगी

जीत जाता हूँ l

यादें

जज्बातों का वो सैलाब जो कभी मुझमे मुझ तक था

वो पिछली बारिश में कुछ धुल सा गया हैं

जिंदगी कुछ इस तरह गुजर रही हैं कि

न दोपहर होती हैं और न अब शाम होती हैं I


आरजू का वो बवंडर जो मुझमे तुझ तक था

वो मेरे आंसूओं में कुछ घुल सा गया हैं

मोहरों की खाली डिब्बो सी हो गयी हैं ये जुस्तजू

न कोई चाल चलता हैं न कोई बाजी होती हैं I

बारिश में मेरा गुनगुनाना जो मुझ में कल तक था

वो आज ग़में जिंदगी में कही खो सा गया हैं

और तन्हाई में अब इस क़दर तन्हा हूँ कि

न कोई हार होती हैं न कोई जीत होती हैं I

गुजरे हुये कल में छुपा एक चेहरा जो तुझ तक था

आज कही समय में धुंधला सा पड़ गया हैं

और वो गए छोड़कर इस हाले मोहब्बत में ऐसे कि

न कोई अब याद करता हैं न कोई अब याद आता हैं I

-अभिषेक

कुछ कहना चाहता हूँ

कुछ कहना चाहता हूँ

उस पुरानी किताब के उस पन्ने को

फिर से पढ़ना चाहता हूँ


पन्ने बदले तेरा शहर छोड़ा

शौक-ए आरजू भी बदल कर देख लिया

पर ना भुला तो वो एहसास

जो आज भी उसी किताब के

एक पन्ने में सजो के रखा हैं


मुकम्मल जिंदगी हैं कि नहीं

ये सांसे तो तय नहीं करती क्यूंकि

जीना सिर्फ पैसो का दीदार ही तो नहीं

और जब दीदार की बात निकली ही हैं

तब उस पन्ने की याद लाजमी ही तो हैं

तुम थी वो एहसास भी था

वो शौक-ए नजर भी थी

जो तुम पे ही आ के रुक जाती थी

आज उन्ही लम्हों को

एक पन्ने में सजो के रखा हैं

और जब लम्हे किसी दिल में संजोये जाये

तब तुम्हारा शुकून-ए-एहसास लाजमी ही तो हैं

-अभिषेक

Tuesday, January 8, 2013

वीरता

अमर यौवन की आग में जल कर
जो प्रलय पौरुष  तपते  हैं
सूर्य,धरा ,देव,मुनि,जन
उनके सम्मुख जा झुकते हैं 

चढ़ी प्रत्यंचा वीरो की जब जब
शत्रु कम्पित हो  उठते हैं
रौद्र रूप धर वीर ही  तब तब
नव क्रांति सृजन की करते हैं

असुरो के  भय  से जब जब
मानव त्रास हुआ हैं
कृष्ण रूप धर वीरो ने ही तब
तब उसका  संहार किया हैं

सिन्धु के उठते ज्वारो में 
जब दंभ नया उपजा  हैं
लेकर जन्म राम का, वीरो ने
उसका भी उत्थान किया हैं

शौर्य  के इस आदित्य को देखा
जब जब जिस यौवन ने
मातृभूमि, धर्म की रक्षा का
लिया शपथ उसने जीवन में

राष्ट्रधर्म की तपती ज्वाला में
प्राणों की आहुति जो देते हैं
सदियों तक उनके पौरुष ही
कवियों के ह्रदय में  बसते हैं